बाग में वो कली मुस्कुराती रही, जिंदगी की खुशी यूँ लुटाती रही। बेखबर थी किसी की बुरी चाल से, पास अपने भ्रमर को बुलाती रही। क्या पता था उसे आ रही है बला? खेल ही तो समझ खिलखिलाती रही। होश आया तभी जब खुला माजरा, फँस गयी कैद में छटपटाती रही। बिंधता ही गया था कली का हृदय, ‘गूँज’ गुम हो गयी, साँस जाती रही। गीता चौबे गूँज राँची झारखंड
Read MoreCategory: कविता
हाइकु
पावस ऋतु भीगे गाँव हमारे भीगे चौबारे * सावन झूला रिमझिम बुंदियाँ झूलें गुइंयाँ * मेघ सींचते प्रकृति और प्यार राग मल्हार * बदरवा में बिजुरी चमचम धमकधम * रजनीगन्धा महके रातरानी जूही दिवानी * शेफाली गुच्छ खिल उठते सुन रागश्री धुन – नीलम वर्मा
Read Moreफिर कब आओगे ?
मन के रसिक बोलो तो सही ,फिर कब आओगे ? अभी तक तुमसे मिल भी नहीं सका था तेरा मुखड़ा भी नहीं देख सका था दिल की बात भी नहीं कह सका था । सोते हुये मुझको चुंबन से , फिर कब जगाओगे ? मन के रसिक बोलो तो सही ,फिर कब आओगे ? दुनिया की नजरों मे जो कुछ भी मेरा है । तुम्हारे बिना सब कुछ आधा – अधूरा है । अभी तो तुम आए थे मन से मन को आत्मसात भी नहीं कर सका था…
Read Moreतुम ! तुम ही हो
रच बस गया है तेरा प्यार मेंहदी सा मेरे तन मन मे अनचाहे , अनायास बेवक्त बेहिसाब । सौम्य , शीतल शांत सिंदूरी आभा जो घिर आई है रह रहकर लहराते केसों के कहर से अनभिज्ञ अविचल व प्रेरक । मुस्कुराहट जो दे जाती है आमंत्रण आलिंगन का बेसब्री का सबूत चाहत का रंग और पता नहीं क्या क्या । सँजो सजाकर रख लिया हूँ उन लमहों के लिए जब दर्दे जिगर होगा और होगा विरह व तनहा एकांत । उसकी वह खुसबू जो मड़राती रहती…
Read Moreअनमना
ऐ समय की वेदिकाओं लो हृदय का दंश देखो, गुप्त पर संवेत होते सूर्य का विध्वंस देखो। राधिका को देखने का है मिला सौभाग्य तुमको, कृष्ण का छलिया बदन बेशक किया था त्याग तुमको। तुम विरह को मानते हो तुम व्यथा को जानते हो, तुम चराचर के सुलगते राग को पहचानते हो। प्रेम एक है राधिका का और मीरा चाहती है, जो यशोदा का परम है पुतना भी पा सकी है। चाह कर ना पा सका खोता गया एहसास तुमसे, द्वेष में ब्रजधाम का फिर क्यूं…
Read Moreश्रमिक
जेठ की तपती दुपहरी पूस की बर्फ़ीली रातें कोई भी मौसम होता श्रमिक कभी नहीं सोता हाड़तोड़ करता परिश्रम न शिकायत न कोई गम सन्तोषी रहता सदा ही राम जप कहता सदा ही ईमान का पक्का श्रमिक इरादों से डिगे न तनिक काम कैसा भी हो कठिन उत्साह नहीं होता मलिन तन से निकला जो पसीना धरती उगले उससे सोना उपजाऊ बनाता कभी वह ठोकता मंजिल कभी वह डॉ0निर्मला शर्मा दौसा राजस्थान
Read Moreडॉ जयप्रकाश मिश्र की कवितायें
मन से बचपन नहीं गया है असली के चक्कर में नकली माल बाँधकर घर को लाते । छायी देख सफेदी ऊपर लोग हमेशा शीश झुकाते ॥ सेविंग कर गालों पर अपने महंगे -महंगे लेप सजाते । हैं तो नकली फिर भी अपने बिन बोले ही दाँत दिखाते , गंजे सिर के ऊपर अक्सर काला -काला रंग लगाते । । तन से उम्र ढली है लेकिन मन से बचपन नहीं गया है । बनकर घूमे छैलबिहारी , मानो यौवन नया -नया है । युवती के सिर अपने दोनों…
Read Moreभिखारी
हाथ में लेकर कटोरा,मांगता वह भीख है। भूख से लाचार दिखता,दे रहा कुछ सीख है।। कह रहा कुछ भी कहाँ वह,बस रहा वह चीख है। बस उदर की तृप्ति खातिर,कर रहा वह कीक है।। फट गये परिधान उसके,गंदगी की छींट है। उठ रही दुर्गन्ध तन से,पर जमा वह ढीठ है ।। रंग काला हो गया है, आँख उसकी पीत है। देह में हड्डी बची बस,पेट में ही पीठ है।। रोटियों की याचना में ,डालता वह दीठ है। गर न मिलती रोटियाँ है, वह सुनाता झीख है।। नहीं चहिए…
Read Moreकविता क्यों लिखती हूँ
यह काल जैसे प्रसव पीड़ा का हैँ… तन और मन को झकझोर कर रख देने वाली प्रसव वेदना… *शायद कुछ नया जन्म लेने वाला हैँ…* वो वेदना, जो अपनों ने दीं…. समाज ने, वक़्त ने… वह वेदना प्रसव वेदना सी ही…. मुझे कलपा रही हैँ . शरीर का रेशा रेशा चीख रहा हैँ नस- नस, पोर – पोर तिड़क रहा हैँ ज़ेहन में हर तंतु मथ रहा हैँ माथे की नस तनते-तनते फटने को हैँ कसती, ढीली होती हुई ऱगे दर्द से चीत्कारती साँसे , मुट्ठी कसते हाथ, कसमसाता, उबलता…
Read Moreराकेश छोकर की कवितायें
इस शहर में काम,काम औऱ काम काम के बोझ से लदपद मै सुबह,दोपहर, शाम। बिजली की चौन्ध में दमदमाती वो शाम नींद के झटकों से उलझी रात और उस रात के आग़ोश से खोये अनगिनत तारे जिनसे बेख़बर हुआ मैं बुजर्गों से सुने थे जिनके किस्से । कभी कभी सोचता हूँ उन्ही किस्सों की घनेरी, अंधेरी रात के बारे में क्यूँ नजराया सितारों का जमघट और वो चाँद का हाशिया इस शहर में। इंजनों की काली स्याह से रचता दिन गर्मचारकोल की चिपचिपाहट से सुरबद्ध बेढंगे संगीत के शोर…
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