ग़ज़ल

  लगता नहीं है दिल कहीं  तेरे जहान में। तुझको पुकारूं रात दिन अपनी अज़ान में।।   बेबस हुआ है बाप ,बुढ़ापा बिगड़ गया, बहुएँ लड़ें हैं घर में , तो  बेटे दुकान में।   जख़्मी हुई है ज़िंदगी हर सांस पर यहाँ, तूने चढ़ाये तीर थे  कितने कमान में।   चाँदी सभी ने बाँट ली,सोना बँटा सभी तस्वीर छोड़ी बाप की उजड़े मकान में।   चहरा बुझा-बुझा हुआ, आँखे उदास हैं, क्या  ज़िंदगी ये आ गई अपनी ढलान में।   हमने बुलाया जो उन्हें पढ़ने कलाम इक, आधी घड़ी…

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ग़ज़ल

जब भी हयात आब को बिसयार देती है माँ की दुआ इलाह को ललकार देती है   रुलाये ख़्वाब भी ना कोई उसके बच्चे को जब माँ सुलाती है तो वो, थुथकार देती है   पल भर में भूल जाता है वो अपने दर्द को माँ देख कर यूँ बच्चे को पुचकार देती है बेरोज़गारी तो यूँ ही बदनाम फिरती है फिलहाल रोजगार भी अफ़कार देती है   कुर्सी के आस-पास अगर पहुँचे अर्ज़ियाँ तो मेज पे दबा भी ये सरकार देती है   ~ तान्या सिंह गोरखपुर, उत्तर-प्रदेश  

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ग़ज़ल

चाहे अब बेशक़ सताएँ ग़म किसी भी तौर पर टूटने देंगे न ख़ुदको हम किसी भी तौर पर   एक ठोकर भी जरूरी है सँभलने के लिए मत मनाओ हार का मातम किसी भी तौर पर   मुस्कुराकर सामना करते रहो हालात का आँखों को करना न हरगिज़ नम किसी भी तौर पर   ज़िंदगी है नाव तो पतवार है इसकी यही खोने मत देना यहाँ संयम किसी भी तौर पर   हम सृजन के बीज हैं अंकुर हमें कहते हैं सब आँकना हरगिज़ न हमको कम किसी भी तौर…

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ग़ज़ल

पाने की आरज़ू थी उसे,  अब नहीं रही ख़ुशियों भरे वो दिन वो हसीं शब नहीं रही जाने हुआ है क्या कि मेरा  प्यार खो गया मैं भी, अगरचे, पहले थी जो अब नहीं रही क़िस्मत से लड़ रही हूँ, शिकायत कभी न की दुश्वारी आदमी को भला कब नहीं रही रखती नहीं ज़ियादा उमीदें किसी से मैं तुझ से भी कुछ तवक्को, मेरे रब, नहीं रही (तवक्को = आशा) हसरत, न आरज़ू, न तमन्ना, न जुस्तजू मन में किसी की ‘कामना’ ही अब नहीं रही   कामना मिश्रा दिल्ली,…

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गजल

ख़ुद ही रोयें, ख़ुद मुस्काने लगते हैं इश्क़ में डूबे लोग दिवाने लगते हैं चार ही लोगों का क़िस्सा है सारे दिन जब चाहे तब बात बनाने लगते हैं आकर बैठो पास मेरे और सुन लो तुम कैसे-कैसे ख़्वाब सताने लगते हैं जगते हैं दिन रात न जाने क्यों ये लोग मुझको तो ये लोग दिवाने लगते हैं तेरे प्यार में पड़कर हमने ये जाना ख़ुश होकर क्यों अश्क बहाने लगते हैं रूप बदल लेने से आख़िर क्या होगा रंग असल ही लोग दिखाने लगते हैं रिश्तों पर पैसे ने…

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गजल

बताओ कौन किसे आसमान देता है। परों को काट के मुझको उड़ान देता है।   ज़मीं नहीं है तो क्या घर बनायें जन्नत में सुना है सबके लिये वो मकान देता है।   ज़ुबाँ दबी है मेरे दोस्तो मगर इक दिन नसीब गूंगे को उसकी ज़बान देता है।   ग़मों के शह्र में होता है  इक तमाशा ही कहाँ मुझे कोई अम्नो अमान देता है।   नहीं है शर्म उसे जाने कितने मंचों से, हया बचाने के झूठे बयान देता है।   पता नहीं था ख़ुदा आज ये मालूम हुआ,…

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ग़ज़ल

पांव पड़कर मौलवी और पादरी के। लिख रहें हैं हर्फ़ इंग्लिश फ़ारसी के।   छुप गया सूरज घने इन बादलों में, खोखले वादे किये क्यों रोशनी के।   झोंपड़ी में ये अना मर जायेगी फिर, दिन बहुत अच्छे लगेंगे तीरगी के।   इश्क़! इतना सोचकर मुझको बता तू, इम्तिहां कितने हुए पाकीज़गी के।   जड़ दरख्तों की हिला सकते नहीं तुम जब तलक दुश्मन न हों अपने उसी के।   शौक़ से पीता नहीं तो क्या मैं करता, ज़ह्र में कुछ पल मिले उसकी ख़ुशी के।   वो नदी है…

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गजल

आप का ऩजरें झुकाना आज हमको याद है। चंद पल का मुस्कुराना आज हमको याद है ।। देख कर भी कुछ न कहना देखते रहना सदा। बिन कहे सब कुछ जतानाआज हमको याद है ।। धूप में छत पर टहलना देखना घर को मेरे। बेव़जह खिड़की पे’आनाआज हमको याद है ।। ख़त बनाकर भेजने की कोशिशें बेकार थी। दूर से ख़त को दिखाना आज हमको याद है ।। राह जाते देख कर के दूर जाते थे कभी। पास आने का बहाना आज हमको याद है ।। रात में करवट बदलना…

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गजल

1 गुमसुम लम्हें  सन्नाटे गहरे जाएं तो जाएं कहाँ उस पर बैठे यादों के पहरे जाएं तो जाएं कहाँ   है बहुत मासूम ये दिल, धड़के भी रह रह कर घूरते  अनजाने  चेहरे  , जाएं  तो  जाएं कहाँ   हैं बहुत ही  दूर  मुझसे ,अब लफ़्ज़ों के दायरे मायने  समंदर  से  गहरे  जाएं तो  जाएं कहाँ   है यहाँ कुछ भी  नही  बस खामोशी के सिवा रूठे रूठे,कुछ लम्हे ठहरे जाएं तो जाएं कहाँ   करते है  पीछा अल्फ़ाज़ मेरे बनके गहरे साये दुश्मन  खुद अल्फ़ाज़ मेरे जाएं तो जाएं…

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