गजल

बताओ कौन किसे आसमान देता है।

परों को काट के मुझको उड़ान देता है।

 

ज़मीं नहीं है तो क्या घर बनायें जन्नत में

सुना है सबके लिये वो मकान देता है।

 

ज़ुबाँ दबी है मेरे दोस्तो मगर इक दिन

नसीब गूंगे को उसकी ज़बान देता है।

 

ग़मों के शह्र में होता है  इक तमाशा ही

कहाँ मुझे कोई अम्नो अमान देता है।

 

नहीं है शर्म उसे जाने कितने मंचों से,

हया बचाने के झूठे बयान देता है।

 

पता नहीं था ख़ुदा आज ये मालूम हुआ,

बदन में दर्द सभी को समान देता है।

 

परिंदा क्रोंच ही मारा गया “शजर” वर्ना,

जहां में किसके लिए कौन जान देता है।

 

विनोद सिंह नामदेव

“शजर” शिवपुरी मध्य-प्रदेश

9826627290

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