काव्य-चेतना में स्त्री की आत्मगाथा : ‘संग तुम्हारे’

जीवन कोई पूर्व निर्धारित रेखा नहीं है जिसे तय कर लेना ही उसकी संपूर्णता हो, बल्कि वह अनुभवों का एक विस्तार है, जो मनुष्य के भीतर गहराइयों तक उतरता है। यह यात्रा तभी सार्थक बनती है जब उसमें व्यक्ति का अंतर्मन पूर्णतः जुड़ता है। अध्यापिका-कवयित्री तरुणा पुण्डीर ‘तरुनिल’ का काव्य इसी जीवन-यात्रा का एक भाव-प्रधान दस्तावेज़ है, जो उनके आत्मबोध और समष्टिगत चेतना से उपजा है। उनका हालिया कविता संग्रह ‘संग तुम्हारे’ इस यात्रा का जीवंत प्रमाण है। ‘संग तुम्हारे’ संग्रह की कविताएँ केवल कोमल भावनाओं की अभिव्यक्ति नहीं हैं,…

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डा अमिता दुबे सर्वभाषा साहित्य सृजन सम्मान –2023 से सम्मानित

प्रो रामदरश मिश्र ने उनके कृतित्व की भूरि – भूरि सराहना की। • नई दिल्ली, 11 सितंबर, 2023. हिंदी की सुपरिचित कवयित्री कथाकार आलोचक डा अमिता दुबे को सर्वभाषा ट्रस्ट की ओर से सर्वभाषा साहित्य सृजन सम्मान से सम्मानित किया गया । यह सम्मान ट्रस्ट की ओर से प्रोफेसर रामदरश मिश्र ने अपने आवास पर आयोजित एक सादे समारोह में प्रदान किया। डा अमिता दुबे को उन्होंने शॉल से विभूषित कर सम्मान प्रतीक चिन्ह एवं प्रशस्ति पत्र भेंट किया। इस अवसर पर हिंदी के समालोचक कवि डा ओम निश्चल, सुपरिचित…

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थाई भारत गौरव सम्मान से सम्मानित हुई हिन्दी की गूंज की प्रधान संपादक

थाइलैंड  मे सम्पन्न  हुये एक हिन्दी साहित्य के सम्मान समारोह मे हिन्दी की गूंज की प्रधान संपादक रमा शर्मा को ‘थाई भारत गौरव सम्मान’ से सम्मानित  किया गया। हिन्दी की गूंज  पत्रिका परिवार इस सम्मान से आह्लादित है।

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जापान में भारतीय दूतावास में रक्षाबंधन

जापान में भारतीय दूतावास में रक्षाबंधन मनाया गया । बच्चों ने भारतीय दूत ( एम्बेसडर) को राखी बांधी, हम सब ने भी उन्हें तथा उनकी पत्नी को तिलक किया, रक्षाबंधन के गीत गाये गए और …….. हिंदी की गूंज पत्रिका का लोकार्पण हुआ वहाँ आप सब को भी रक्षाबंधन और हिंदी की गूंज की सफलता की अनेकों बधाई।

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बदलाव के साथ स्वयं को समायोजित करने का गुण हर परिस्थिति में कारगर

भारतीय मूल का व्यक्ति विश्व में कहीं भी, किसी भी देश में हो–एक अलग पहचान रखता है| भारतीय सभ्यता, संस्कृति की झलक व्यक्तित्व को एक अलग आभा प्रदान कर एक विशिष्ट पहचान देती है| उत्तर-दक्षिण, पूर्व-पश्चिम, दिशाएँ महत्त्व नहीं रखती, महत्त्व होता है जड़ों का| भारत की मिट्टी से जुड़ाव, फिर वह जुड़ाव चाहे कितने ही वर्षों पुराना हो| जैसे एक परिवार के विभिन्न लोग अपना वैशिष्ट्य बनाये हुए भी एक-दूसरे से मिलते-जुलते-से लगते हैं वैसे ही विश्व के किसी कोने में रहने वाला भारतीय मूल का व्यक्ति एक विशेष…

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संपादकीय

समस्या कोई ऐसी नहीं जिसका समाधान न हो लेकिन मनुष्य का चंचल मन जल्दी छुटकारा पाना के लिए कभी-कभी ऐसी गलतियाँ कर बैठता है जिससे वो समस्या में उलझता ही जाता है | समस्या आने पर सबसे पहला कार्य तो यह है कि खूब अच्छे से शांत मन से उस पर विचार करें कि यह क्यों आया और इसके संभव समाधान क्या हो सकते हैं फिर अपने सामर्थ्य ,बुद्धि और विवेक से इसके समाधान पर कार्य प्रारम्भ करना चाहिए | मन को शांत रख कर जीवन में ख़ुशी प्राप्त करने…

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संपादकीय

आगे बढ़ना चाहिए | कुछ की मनुष्य होंगे जिसकी सारी मनोकामना पूरी होती हो,जिसके सारे कार्य सिद्ध होते हो ,जिसका हर उद्देश्य पूरा होता हो | इसलिए संतोष सबसे जरुरी है | कुछ लोग असफलता को बर्दाश्त नहीं पाते वो सच्चे मायने में जीवन की सार्थकता को समझ नहीं पाते हैं | सफलता और असफलता आगे पीछे चलते हैं | दोनों का समावेश संभव है इसे स्वीकार करना ही जीत का मूल मन्त्र है | असफलता आपको और मजबूत करने के लिए होती है ,आपको अपनी गलतियों को समझने का…

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मुस्कान खोती कली

बाग में वो कली मुस्कुराती रही, जिंदगी की खुशी यूँ लुटाती रही।   बेखबर थी किसी की बुरी चाल से, पास अपने भ्रमर को बुलाती रही।   क्या पता था उसे आ रही है बला? खेल ही तो समझ खिलखिलाती रही।   होश आया तभी जब खुला माजरा, फँस गयी कैद में छटपटाती रही।   बिंधता ही गया था कली का हृदय, ‘गूँज’ गुम हो गयी, साँस जाती रही।               गीता चौबे गूँज राँची झारखंड

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एक दिन तू आएगा ज़रूर

तू तो अलग ही मिट्टी का बना था वतन परस्ती के इश्क़ में रमा था तेरी तो बस इतनी सी दास्तान है तेरे महबूब का नाम हिन्दुस्तान है   ऐशो आराम ,रेशमी लिबास कहाँ तूने तो बस चुना तिरंगे का कफ़न वतन की शान जिसकी पहचान उस वीर को हमारा शत शत नमन   एक सवाल… तेरे बलिदान से मुल्क में क्या बदला? सब कुछ तो अब भी पहले जैसा है चौराहे की मूर्ति बन तू रह गया सबसे क़ीमती आज भी बस पैसा है   माँ तो आज भी तेरी राह तकती है बाप की आँखों से उदासी झलकती है बहन ससुराल गई फिर भी वो उदास हैं राखी से तेरी कलाई सजाने की आस है   तेरी सोहनी आज भी ख़ूब सँवरती हैं उसे आज भी तेरे आने का इंतज़ार है लौटकर वापस कभी ना आएगा तू मानने को ये बात क़तई न तैयार है   तू तो ज़मीनी रिश्तों से मुँह मोड़ गया अपनों को दिया हर वादा तोड़ गया कभी वहाँ से ज़रा झाँक के तो देख सिक्के के दूसरे पहलू को आंक के तो देख   माँ ने अभी अभी चूल्हा जलाया है तेरे हिस्से की रोटी प्यार से पकाया है छोटी सी इल्तजा है एक बार तो आजा माँ के हाथों से दो निवाला तो खा जा   मोतियाबिंद बाप की आँखे निगल रही है उसे अपना वर्दी वाला रूप तो दिखा जा सोहनी आज भी लाल जोड़ा पहने बैठी है सूनी माँग उसकी एक बार तो सजा जा वतन का हर फ़र्ज़ तो अता किया तूने बाक़ी रह गये इन क़र्ज़ों को भी चुका जा   मुझे यक़ीन है … तेरा गाँव तुझे बुलाएगा ज़रूर तू अपनों से मिलने आएगा ज़रूर   हवा के झोंके संग, ओस की बूंदें बन खेतों की हरियाली में, शाम की लाली में घटाओं में ढल, बारिश की बूंदों में बदल अपने गाँव में बरस जाने खेतों की मिट्टी में समा जाने अपनों की प्यास बुझा जाने मुझे यक़ीन है तू आएगा बारिश की बूंदों संग ज़रूर आएगा   श्वेता सिंह ‘उमा’ मास्को, रुस

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मीना अरोरा की दो लघुकथाएँ

एक्सपेरिमेंट   जूनियर डाक्टर सीनियर डाक्टर से:-“सर,आज जो नया पेशेंट आया है।उसकी भी वही हालत है जो दो दिन पहले मरने वाले मरीज की थी।” सीनियर:-“मतलब,इसका भी हीमोग्लोबिन कम है। इस बार तुम पिछले वाले से एक यूनिट कम ब्लड चढ़ाना। पिछली बार ब्लड की मात्रा बढ़ने से ही मरीज की मौत हुई है।” जूनियर:-“ठीक है सर,इस बार कम ब्लड चढ़ा कर देखता हूं। अगर यह वाला मरीज बच गया तो आगे से एक साथ बहुत सारा ब्लड नहीं चढ़ाया करूंगा।” सीनियर डाक्टर हंसते हुए:-“अपने साथ वालों से इंटेलिजेंट हो…

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