अभी कल की ही बात है आयुष का अख़बार में नाम छपा था, अपने ज़िले में दसवीं कक्षा में टॉप किया था उसने। बारहवीं में भी अच्छे अंक पाकर देश के प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग संस्थान आई.आई. टी दिल्ली में दाखिला हुआ था। भगवान बुरी नज़र से बचाये, माँ उसकी बलायें लेती न थकती थी। आखिर वह दिन भी आ गया जब उसे दिल्ली के लिए रवाना होना था। माँ का रो रोकर बुरा हाल था और साथ ही चिंता ..दिल्ली जैसे बड़े शहर में ..कहीं कुछ अनहोनी न घट जाए ।…
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कलमुँही
हाँ!! यही तो नाम था उसका, बचपन से बस इसी नाम से तो पुकारा जाता था उसे, नानी भी यही कहती थी ‘अरी कलमुँही! बहरी है क्या, अरे कलमुँही! पैदा होते ही मर क्यों न गयी, उनके ये शब्द सदा ही जिन्दा होने के एहसास को मार देते थे। लगता था कोई पुतला है वो, जिसमे रोबोटिक शक्ति आ गयी हो और नाना उसे देखकर जाने क्यों सर घुमा लेते थे। सच कहूँ तो कभी समझ नहीं पायी वो, कि ये घृणा थी या शर्मिंदगी, पर जो भी थी बहुत सच्ची थी। ये तो है जब भी जिसने भी उसके प्रति अपनी भावना दर्शायी, बिलकुल सोलह आने सच्ची थी। हाँ!! ये बात अलग है उसमे नफरत, घृणा, कडुवाहट ही उसके हिस्से आई। कहते है न कोई बात बार – बार कही जाये, तो वो ही अच्छी लगने लगती है, बस बहुत प्यारा लगने लगा उसे उसका नाम ”कलमुँही”। कई बार जानना चाहा क्यों है कलमुँही वो। रंग तो गोरा था उसका, शुक्लपक्ष के चाँद जैसा, उजला। कहा तो किसी ने कभी नहीं मुँह से, पर दर्पण कहता था रात के अँधेरे में चुपके से जब वो उसे देखती थी, अंतर्मन दर्पण की आवाज बनकर चीत्कार करता था “बहुत सुन्दर है रे तू कलमुँही”। हँस पड़ती थी वो खुलकर, एक रात और अंधेरा ही तो उसका अपना था। पर तब भी जाने क्यों आँखे कभी उसकी ख़ुशी का साथ नहीं देती थी, जलनखोट्टी भर जाती थी नीर से और कर देती थी धुंधला, अधूरे पूरे सच को। कहती थी वो दीदी!! दुश्मन अखियाँ ! मेरी सुन्दरता से जलकर आँसू बहाती है । यौवन आया तो सपने भी आये सोचा कोई तो अपना होगा जो उसके रूप को सराहेगा कम से कम कलमुँही नहीं कहेगा। पर कलमुँही ! कलमुँही ही रही, क्या सास, क्या पति बस परिवेश और घर बदल गए थे। भावनाएं वही चित-परिचित। यूँ तो उसे आदत थी अपने प्रति लोंगों की उपेक्षा और तिरस्कार के व्यवहार की। पर स्वप्न टूटे थे वो भी यौवन के प्रेम और अनुराग से पूर्ण। बचपन से यही व्यवहार उसके लिए सामान्य व्यवहार रहा था इसलिए बुरा लगने की भावना से कोसों दूर थी। पर प्रेम जिसकी लालसा थी उसे, जो कल्पना मे था उसके, पति से उपेक्षा असहनीय क्यों होने लगी थी। सुना था मिट्टी की दीवारों के पीछे से उसने जब नाना ने कहा था जमीन जाती है तो जाये बस इस कलमुँही को निकालो यहां से। प्रश्न तो ये भी था क्या वो दहेज के नाम पर बेची गयी थी पर उससे भी विकट प्रश्न प्रेम का न होना था। उम्र के सोलहवें दौर मे प्रेम से बड़ा कोई प्रश्न नही होता है। क्यों नही करते मेरे अपने मुझसे प्रेम, जिज्ञासा ने मन को झकझोर दिया, माना गड़े मुर्दे उखाड़ने से सडांध ही फैलती है, पर जानना था और जान भी गयी, निशानी थी कलमुँही, किसी की मानसिक विकृतता की, वहशी पन, तन की भूख की। उसकी माँ तो पुरुष के दंभ, भूख, हविश का शिकार हो गयी पर उसे छोड़ गयी जीते जी मरने के लिए। सोच में थी और पीड़ा में भी …द्वन्द – अंतर्द्वंद सा उठा था मन में ”कलमुँही वो कैसे” ?? उसका तो दोष भी नहीं था, फिर आप उन्हें क्या कहेंगे जो कर्म काला करते है???? प्रश्न! प्रश्न! प्रश्न! उत्तर अनुत्तरित कलमुँही। @डॉ शिप्रा शिल्पी सक्सेना शिक्षाविद, साहित्यकार, पत्रकार, कवियत्री एवं मीडिया इंस्ट्रक्टर कोलोन, जर्मनी saksenashipra@gmail.com
Read Moreहाइकु
पावस ऋतु भीगे गाँव हमारे भीगे चौबारे * सावन झूला रिमझिम बुंदियाँ झूलें गुइंयाँ * मेघ सींचते प्रकृति और प्यार राग मल्हार * बदरवा में बिजुरी चमचम धमकधम * रजनीगन्धा महके रातरानी जूही दिवानी * शेफाली गुच्छ खिल उठते सुन रागश्री धुन – नीलम वर्मा
Read Moreफिर कब आओगे ?
मन के रसिक बोलो तो सही ,फिर कब आओगे ? अभी तक तुमसे मिल भी नहीं सका था तेरा मुखड़ा भी नहीं देख सका था दिल की बात भी नहीं कह सका था । सोते हुये मुझको चुंबन से , फिर कब जगाओगे ? मन के रसिक बोलो तो सही ,फिर कब आओगे ? दुनिया की नजरों मे जो कुछ भी मेरा है । तुम्हारे बिना सब कुछ आधा – अधूरा है । अभी तो तुम आए थे मन से मन को आत्मसात भी नहीं कर सका था…
Read Moreतुम ! तुम ही हो
रच बस गया है तेरा प्यार मेंहदी सा मेरे तन मन मे अनचाहे , अनायास बेवक्त बेहिसाब । सौम्य , शीतल शांत सिंदूरी आभा जो घिर आई है रह रहकर लहराते केसों के कहर से अनभिज्ञ अविचल व प्रेरक । मुस्कुराहट जो दे जाती है आमंत्रण आलिंगन का बेसब्री का सबूत चाहत का रंग और पता नहीं क्या क्या । सँजो सजाकर रख लिया हूँ उन लमहों के लिए जब दर्दे जिगर होगा और होगा विरह व तनहा एकांत । उसकी वह खुसबू जो मड़राती रहती…
Read Moreअनमना
ऐ समय की वेदिकाओं लो हृदय का दंश देखो, गुप्त पर संवेत होते सूर्य का विध्वंस देखो। राधिका को देखने का है मिला सौभाग्य तुमको, कृष्ण का छलिया बदन बेशक किया था त्याग तुमको। तुम विरह को मानते हो तुम व्यथा को जानते हो, तुम चराचर के सुलगते राग को पहचानते हो। प्रेम एक है राधिका का और मीरा चाहती है, जो यशोदा का परम है पुतना भी पा सकी है। चाह कर ना पा सका खोता गया एहसास तुमसे, द्वेष में ब्रजधाम का फिर क्यूं…
Read Moreबौद्ध कालीन भाषिक परिवेश एवं भाषागत विविधताएं
शोध सारांशिका-भाषा किसी भी कालखंड में किसी भी समाज के द्वारा विचारों के आदान-प्रदान का एक सशक्त साधन है । जब हम अपनी अभिव्यक्ति यों को समृद्ध करते हुए अनुभूति को उसमें समाहित कर के जनसामान्य तक अपनी बात पहुंचाना चाहते हैं, तो उसके लिए भाषा अत्यंत प्रभावशाली माध्यम माना जाता है । हमारे द्वारा अपनाए गए शब्द हमारा परिचय और हमारा पहचान देते हैं। हम यह मानते हैं कि भाषा के द्वारा ही किसी भी कालखंड की परंपराओं को रीति रिवाज को मान्यताओं को जाना जा सकता है, पहचाना…
Read Moreनातेदार
आफिस का कार्य खत्म हो गया था दिव्यांश वापसी के लिए मुम्बई से दिल्ली आने की तैयारी करने लगा। प्रातः 5.45 पर मुम्बई वी.टी. से ट्रेन पकड़नी थी। होटल मैनेजर से ज्ञात हुआ कि सुबह 6 बजे के बाद ही आटो या टैक्सी रेलवे स्टेशन तक जाने के लिए मिलेगी। काफी सोच-विचार करने के बाद दिव्यांश ने निर्णय लिया कि अगर वह रात में ही रेलवे स्टेशन चला जाए तो बेहतर रहेगा। सारा सामान लेकर वह स्टेशन पर आ गया। वेटिंग रूम में पहुँचने पर वेंटिग रूम के इंचार्ज ने…
Read Moreडाइरी के पन्नों से
तकरीबन 15 रोज हो गए हमारे बीच कोई बातचीत नहीं हुई,यूँ तो ज़िंदगी ऊपर से बिलकुल सहज है मगर अंदर बहुत कुछ दरक गया है…..16 साल….एक युग कहलाता है…..इन 16 सालों में क्या क्या नही गुज़र गया….अब तो बच्चे भी बड़े हो गए हैं।तुमने एक बार कहा तो होता कि तुम्हारी ज़िंदगी में कोई धीरे धीरे मेरी जगह ले रहा है। ऐसी क्या कमी थी मेरे प्यार,विश्वास एउम समर्पण में….गर सोचने बैठू तो दिमाग की नसें फटने लगती हैं। उफ कितनी शातिरता से तुम दोनों तरफ रिश्ते निभाते रहे…किसी को…
Read Moreदरकता अमेरिकी लोकतंत्र और भारत की उम्मीदें
( भविष्य में भारत- अमेरिका संबंध बिडेन प्रशासन के तहत कैसे रहेंगे ये अभी भविष्य के गर्त में है.भारत को संवेदनशील मुद्दों पर कड़ी बातचीत करने के लिए तैयार रहना चाहिए। कोविद-19 संक्रमणों के नियंत्रण और आर्थिक सुधार के साथ संयुक्त, अमेरिका फिर से वैश्विक अर्थव्यवस्था को एक विकास प्रदान कर सकता है. भारत जैसे देशों को अपने निर्यात को बढ़ावा देने और बढ़ने की आवश्यकता है. नए दौर में दोनों देशों को सामरिक आयाम के साथ आर्थिक और वाणिज्यिक आयाम को अधिक प्राथमिकता के साथ व्यवहार करना चाहिए )…
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