काव्य-चेतना में स्त्री की आत्मगाथा : ‘संग तुम्हारे’

जीवन कोई पूर्व निर्धारित रेखा नहीं है जिसे तय कर लेना ही उसकी संपूर्णता हो, बल्कि वह अनुभवों का एक विस्तार है, जो मनुष्य के भीतर गहराइयों तक उतरता है। यह यात्रा तभी सार्थक बनती है जब उसमें व्यक्ति का अंतर्मन पूर्णतः जुड़ता है। अध्यापिका-कवयित्री तरुणा पुण्डीर ‘तरुनिल’ का काव्य इसी जीवन-यात्रा का एक भाव-प्रधान दस्तावेज़ है, जो उनके आत्मबोध और समष्टिगत चेतना से उपजा है। उनका हालिया कविता संग्रह ‘संग तुम्हारे’ इस यात्रा का जीवंत प्रमाण है। ‘संग तुम्हारे’ संग्रह की कविताएँ केवल कोमल भावनाओं की अभिव्यक्ति नहीं हैं,…

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फिर कब आओगे ?

मन के रसिक बोलो तो सही ,फिर कब आओगे ? अभी तक तुमसे मिल भी नहीं सका था तेरा मुखड़ा भी नहीं देख सका था दिल की बात भी नहीं कह सका था ।   सोते हुये मुझको चुंबन से , फिर कब जगाओगे ? मन के रसिक बोलो तो सही ,फिर कब आओगे ?   दुनिया की नजरों मे जो कुछ भी मेरा है । तुम्हारे बिना सब कुछ आधा – अधूरा है । अभी तो तुम आए थे मन से मन को आत्मसात भी नहीं कर सका था…

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तुम ! तुम ही हो

रच बस गया है तेरा प्यार मेंहदी सा मेरे तन मन मे अनचाहे , अनायास बेवक्त बेहिसाब  ।   सौम्य , शीतल शांत सिंदूरी आभा जो घिर आई है रह रहकर लहराते केसों के कहर से अनभिज्ञ अविचल व प्रेरक ।   मुस्कुराहट जो दे जाती है आमंत्रण आलिंगन का बेसब्री का सबूत चाहत का रंग और पता नहीं क्या क्या ।   सँजो सजाकर रख लिया हूँ उन लमहों के लिए जब दर्दे जिगर होगा और होगा विरह व तनहा एकांत ।   उसकी वह खुसबू जो मड़राती रहती…

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