धारा के विपरीत उतरना है

आओ साथी करें मरम्मत नाव की

धारा के विपरीत उतरना है l

 

गड़बड़ मौसम,तेज़ आधियाँ टूटी है पतवार

फ़ँसे हुए हैं इस तट पर जाना होगा उस पार

मन में संशय पैदा करती हैं ऊँची लहरें

किन्तु लक्ष्य से पूर्व कहो कब पथिक कहीं ठहरे

 

आधे रस्ते में रुकना स्वीकार नहीं

अंतिम साँस तलक दम भरना है ll

 

 

माना लोग डराएंगे पर हमें नहीं डरना

नकारात्मक होकर के बिन मौत नहीं मरना

मौसम सदा नहीं रहता है यूँ बिगड़ा-बिगड़ा

इच्छाशक्ति के आगे तूफान करेगा क्या

 

कभी नहीं थकना है ,हरदम बढ़ना है

संघर्षों में और निखरना है ll

 

 

लकड़ी ,टीन और बासों की नहीं हमारी नाव

आशाओं से,विश्वासों से बनी हमारी नाव

सैलाबों के हर मंसूबों को बेकार किया

जाने कितने सागर इसके बूते पार किया

 

सागर तो जीवन पथ है फिर क्या रुकना

मंज़िल पर ही हमें ठहरना है ll

 

 

~विनोद पाण्डेय

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