शहर के विख्यात संभागर पूजा सदन में आज लोकप्रिय पत्रिका ‘नियति’ के 25 वर्ष होने पर कार्यक्रम का आयोजन था | पत्रिका के सम्पादक श्री देवेंद्र पर एक व्यक्तित्व एवं कृतित्व को लक्ष्य करके रघुनाथ द्वारा सम्पादित पत्रिका ‘सुलभा’ का अंक भी आज ही इसी की साथ लोकार्पित होना था | सभागार में काफी गहमा गहमी थी | मेरी बगल वाली सीट पर बैठे रवि जी ने प्रश्न किया, मित्रवर क्या बात है ? कुछ माह पहली सुलभा के संपादक रघुनाथ का व्यक्तित्व व कृतित्व पर केंद्रित ‘नियति ‘ का अंक भी आया…
Read MoreDay: August 30, 2023
पर्यावरण बचाओ
भारी संकट आन पड़ा है, धरती कौन बचायेगा। मानवता का नाम निशां तब, पृथ्वी से मिट जायेगा।1 बढ़ा प्रदूषण धरती पर यूं, जनता सारी त्रस्त हुई। महामारियां जन्म ले रहीं, मानव क्या बच पायेगा।2 नंगी होती धरा नित्य दिन, पर्वत जंगल का हो विनाश। खातिर आने वाली पीढ़ी , पादप कौन लगायेगा।3 ग्रसित दिशाएँ धूल गर्द से, लेना सांस हुआ भारी। पीकर रोज विषैली गैसें, कैसे स्वास्थ्य बनायेगा।4 बन अज्ञानी नाश कर रहे, भूमंडल की थाती को। पर्यावरण बचाएं कैसे, आखिर कौन बतायेगा।5 जिधर नज़र जाती है दिखता, ढेर प्लास्टिक…
Read Moreअनेकता में एकता का स्वर है- हिंदी
हिंदी हिंदुस्तान की भाषा है।हिंदी भारत देश की मातृभाषा है और अनेकता में एकता का स्वर है हमारी हिंदी। इसका सम्मान करना हम सब देशवासियों का कर्तव्य है। दुनिया भर में हर साल 10 जनवरी को विश्व हिंदी दिवस मनाया जाता है लेकिन भारत देश की मातृभाषा हिंदी दिवस 14 सितंबर को राष्ट्रीय हिंदी दिवस के रूप में मनाते है। हिंदी एक ऐसी भाषा है जो सारे देश को एक सूत्र में बांधती हैं आज भी कई जगह इसका विरोध हो रहा है। आज भी हिंदी दुनिया में सबसे ज्यादा…
Read Moreगजल
बताओ कौन किसे आसमान देता है। परों को काट के मुझको उड़ान देता है। ज़मीं नहीं है तो क्या घर बनायें जन्नत में सुना है सबके लिये वो मकान देता है। ज़ुबाँ दबी है मेरे दोस्तो मगर इक दिन नसीब गूंगे को उसकी ज़बान देता है। ग़मों के शह्र में होता है इक तमाशा ही कहाँ मुझे कोई अम्नो अमान देता है। नहीं है शर्म उसे जाने कितने मंचों से, हया बचाने के झूठे बयान देता है। पता नहीं था ख़ुदा आज ये मालूम हुआ,…
Read Moreग़ज़ल
पांव पड़कर मौलवी और पादरी के। लिख रहें हैं हर्फ़ इंग्लिश फ़ारसी के। छुप गया सूरज घने इन बादलों में, खोखले वादे किये क्यों रोशनी के। झोंपड़ी में ये अना मर जायेगी फिर, दिन बहुत अच्छे लगेंगे तीरगी के। इश्क़! इतना सोचकर मुझको बता तू, इम्तिहां कितने हुए पाकीज़गी के। जड़ दरख्तों की हिला सकते नहीं तुम जब तलक दुश्मन न हों अपने उसी के। शौक़ से पीता नहीं तो क्या मैं करता, ज़ह्र में कुछ पल मिले उसकी ख़ुशी के। वो नदी है…
Read Moreगजल
आप का ऩजरें झुकाना आज हमको याद है। चंद पल का मुस्कुराना आज हमको याद है ।। देख कर भी कुछ न कहना देखते रहना सदा। बिन कहे सब कुछ जतानाआज हमको याद है ।। धूप में छत पर टहलना देखना घर को मेरे। बेव़जह खिड़की पे’आनाआज हमको याद है ।। ख़त बनाकर भेजने की कोशिशें बेकार थी। दूर से ख़त को दिखाना आज हमको याद है ।। राह जाते देख कर के दूर जाते थे कभी। पास आने का बहाना आज हमको याद है ।। रात में करवट बदलना…
Read Moreअपनी बात
इस वर्ष भी हिंदी दिवस बीत गया | हर वर्ष हिंदी दिवस आता है ,हिंदी के लोग पखवाड़े में जागरूक होते हैं। राजभाषा अधिकारियों की सक्रियता देखने लायक होती है। सरकारी संस्थानों में हिंदी के नाम पर कवि सम्मलेन, काव्य-गोष्ठी, काव्य-प्रतियोगिता, वाद-विवाद प्रतियोगिता इत्यादि का आयोजन किया जाता है। उत्सव में उल्लास भी दिखाई देता है और कहीं-कहीं मज़बूरी भी। मज़बूरी का मै कतई समर्थन नहीं करती लेकिन ये एक दिन का उल्लास भी मुझे खटकता है। मैं उल्लास के पक्ष में तो हूँ लेकिन एक दिन के इस उल्लास से हिंदी का कितना भला हो सकता है?…
Read Moreदो टूक कहो
मुँह पर ताला क्या मजबूरी, खुलकर बोलो यार मुंगेरी। जोड़ घटा का वक्त नहीं है, सही गलत का भेद जरूरी। सच को सच कहने का ज़ज्बा, और झूठ को झूठ कहो। किससे डरना क्योंकर डरना, सही बात दो टूक कहो। मौन स्वीकृति और समर्थन, दिखला रहा प्रेम प्रदर्शन। चेहरे की धुँधली रेखाएँ, दिखला देगा उजला दर्पण। आँख के आंसू सूख न जायें, शिथिल न हों कोमल स्पंदन। निहित स्वार्थ की कारा तोड़ो, झूठमूठ के सारे बंधन। कलमकार का फर्ज़ यही है, सच को केवल सच बतलायें। गहन तिमिर का मंथन…
Read Moreट्यूशन
अभिषेक ग्यारहवीं के छमाही परीक्षा में फेल हो गया | हालांकि इस परीक्षा का कुछ तत्कालीन प्रभाव नहीं होता और असली परीक्षा तो फ़ाइनल का ही माना जाता है लेकिन अभिषेक के परिवार वालों के लिए यह एक बड़ी दुर्घटना थी | क्योंकि हाईस्कूल टॉप करने के बाद अभिषेक से और बेहतर करने की उम्मीद थी | परिवार वालों की उदासी देखकर पड़ोसियों ने भी ताड़ लिया कि मामला क्या है | फलस्वरूप वो भी बहुत दुःखी हो गए क्योंकि पिछले सात महीने से अभिषेक का उदाहरण दे कर वो अपने लड़कों को पढ़ाई-लिखाई के लिए खूब कोस रहे थे,खास कर जब उन लोगों के बच्चे…
Read Moreभूख
सकीना चलती चली जा रही थी कितने रास्ते कट गये इसका भान ही नहीं रहा,जब एक पत्थर से ठोकर लगी और अंगूठा लहूलुहान हो गया तब रुकना ही पडा़। थोड़ी देर वहीं बैठकर अंगूठे को सहलाया तब एहसास हुआ कि वह जीवित है । न जाने किस घड़ी में उसकी शादी ख़ुर्शीद के साथ हुई थी । तबसे एक पल का भी चैन नहीं था उसके जीवन में। पेशे से दर्ज़ी और दो बच्चों का बाप था ख़ुर्शीद। ग़रीबी जो न कराए वह कम है। ख़ुर्शीद की बड़ी बेटी नगीना…
Read More