डाल कोरोना कसाई , फूस में चिंगारियाँ , चीन के सौदागरों ने , फूँक दी फुलवारियाँ । विश्व सहमा सा अचानक , मौन है आलोचना , मूँदकर आँखें सियासी , सो गई संवेदना । लाकडाउन में फँसी है ,अर्थ की मादक बहारें , भूख पर पड़ती दया के , बर्फ की ठंडी फुहारें । काँपती अनजान भय से , ट्रंप की लाचारियाँ । चीन के सौदागरों ने , फूँक दी फुलवारियाँ । फ्रांस भी कुंठित हुआ अब ,कष्ट में जापान है , हाथ में काला कटोरा…
Read MoreDay: August 30, 2023
हिन्दी: केवल भाषा ही नहीं बल्कि पूर्ण संस्कृति
सृष्टि के संचालन में संचार की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है अतः संचार के माध्यम का सशक्त होना अति आवश्यक है। जब दो असमान तत्वों के बीच संचार होता है तो उसका माध्यम अनुभव या भाव-भंगिमा इत्यादि हो सकते हैं। जब समान तत्वों के बीच संचार की बात होती है, विशेष तौर से मनुष्य में, तब भाषा बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यही कारण है कि शिशु से भी संवाद करते समय व्यक्ति अपनी मूल भाषा का प्रयोग करता है। शिशु को भले ही वर्णमाला का ज्ञान ना हो किंतु निरंतर…
Read Moreराज की बात
शहर के तपते प्रहर में, छांव देता कौन किसको। शक के घेरे घूरते है, ठाँव देता कौन किसको नीर निर्मल,पीर उज्ज्वल, नीड़ स्वर्णिम पांव जिसको। संग मेरे चल के देखो, देखना है गांव जिसको। दिल की बातें थी बताई, मानकर हमराज जिसको। तीर उसने ही चलाई, क्या बताये और किसको। राज रखना दर्द अपने, मुक्त कर दो तुम खुशी को। चाह गर हमदर्द की है, भूल जाना बेबसी को । चार दिन की जिन्दगी में, थे सुने छल-छिद्र जिसको, रेत मुट्ठी के थे सारे, रख न पाए पास…
Read Moreमहामारी,साहित्य एवं समाज
साहित्य और समाज मानव जीवन के ऐसे दो कड़ी हैं जो हर स्थिति और परिस्थिति में मानव मूल्यों की रक्षा करने, जनकल्याण कार्यों को दिशा देने,विश्व को सही राह दिखाने के लिए प्रतिबद्ध हैं।ये अभी से नहीं सदियों से चला आ रहा है। जब जब मानव मूल्यों में गिरावट, सृष्टि के जीवों में संकट और नकारात्मक विचारों वाले लोग हावी होने के प्रयास किये,या स्वार्थी लोगों के कुत्सित प्रयास हुए हैं, साहित्य और समाज उठ खड़ा हुआ है।अपने जिम्मेदारियों का इन दोनों कड़ियों ने पूरी ईमानदारी से निर्वहन किया है।साहित्य…
Read Moreगुलमोहर
झूलती साँझ, झूले पर उगा, झुनझुनियाँ गुलमोहर…. उसकी आँखों में सुनहले गुलमोहर की लाली छा गई.दिल में घुटन हुई.स्मृतियों का बवंडर उठा,अंखियों की तलैया में अश्रुओं का सोता फुट पड़ा।सामनेवाली छत पर झूलता झुला और वियुक्त खालीपन आंसुओं के मारफत मानो असबाब-सा उड़ पड़ा… बांध पूर्णत: टुटा, जलप्रपात बह निकले, उससे पहले वह घर आ गई।चारपाई पर बैठ ग।.जब वहां से आखिरी बार गुजरी तब झुला रुनक झुनक सांकल से शोभायमान था। दिन के निकलते ही परस्पर हो जाती आँखों की गुफ्तगू…शाम को कोफी के मग से उभरती बाष्प…
Read Moreमिस यू पापा
रीना ने जल्दी-जल्दी सुबह का काम निपटाया और बेटे को स्कूल भेज दिया। पतिदेव की तबियत कुछ ठीक नहीं थी, इस लिए वो अभी सो ही रहे थे। इत्मिनान से अपनी चाय ली और किचन के दरवाजे पर ही बैठ गई; क्यों कि आज फिर से आँगन में कुछ गौरैया आयी थीं। वो चहकते हुए इधर-उधर फुदक रही थीं और वह नहीं चाहती थी कि उसकी वजह से वो सब उड़ जाएँ, इस लिए वहीं बैठ कर उनको देखते हुए चाय पीने लगी। उसने धीरे से हाथ बढ़ा कर पास…
Read Moreचंदा की चांदनी
बहुत लंबी रात है ,चाँद भी कुछ हमारे साथ है बैठे है उनके आगोश में , न जाने कब उनसे मुलाकात हो । गुलज़ार सा हो गया अम्बर आज , कहि नूर न चुरा ले ये जनाब , बैठे है इंतज़ार में, इस बादल की छाव में, तारे सिमट के आ गए , आज सारे इस संसार मैं । क्यों न इतराउ मे , क्यों न शर्माउ में, खुबसुरती की इस चादर में ,क्यों न गुम हो जाओ में । दाग है तुझमे फिर भी ,नाप न पाया तेरी खूबसूरती…
Read Moreगीत
अपनेपन के प्रबल भाव से,सराबोर परिवार रहे। बजे जीत का बिगुल सदा ही,नहीं हृदय में हार रहे।। खिड़की कहती धरती देखो,जहाँ उजाला स्याह नहीं। करना ज्यादा उछल कूद मत,सड़क कटी यह राह नहीं। फूँक फूँक कर कदम बढ़ें सब,अम्बर तक विस्तार रहे।।1 विषम परिस्थितियों में भी प्रिय,अपने पथ पर डटे रहो घर की दीवारें कहती हैं,अपनों से मत कटे रहो पथ प्रशस्त जो करे सभी का,उसी मन्त्र को गढ़े रहो हर मुश्किल को सरल करें जो,कर में वह हथियार रहे।।2 अपने अंक समेट सभी के,सुख दुख भी…
Read Moreआकर तुम मत जाना
आकर तुम मत जाना साजन, आकर तुम मत जाना…. जब आँगन में मेघ निरंतर झर-झर बरस रहे हों| ऐसे में दो विकल हृदय मिलने को तरस रहे हों| जब जल-थल सब एक हुए हों, धरती-अम्बर एकम, शोर मचाता पवन चले जब छेड़-छेड़ कर हर दम| ऐसे में तुम आना साजन! ऐसे में तुम आना, आकर तुम मत जाना साजन………. कंपित हो जब देह, नेह की आशा लेकर आना| प्रेम-मेंह की एक नवल परिभाषा लेकर आना| लहरों से अठखेली करता चाँद कभी देखा है? या आतुर लहरों का उठता नाद कभी देखा है? चंदा…
Read Moreगजल
1 गुमसुम लम्हें सन्नाटे गहरे जाएं तो जाएं कहाँ उस पर बैठे यादों के पहरे जाएं तो जाएं कहाँ है बहुत मासूम ये दिल, धड़के भी रह रह कर घूरते अनजाने चेहरे , जाएं तो जाएं कहाँ हैं बहुत ही दूर मुझसे ,अब लफ़्ज़ों के दायरे मायने समंदर से गहरे जाएं तो जाएं कहाँ है यहाँ कुछ भी नही बस खामोशी के सिवा रूठे रूठे,कुछ लम्हे ठहरे जाएं तो जाएं कहाँ करते है पीछा अल्फ़ाज़ मेरे बनके गहरे साये दुश्मन खुद अल्फ़ाज़ मेरे जाएं तो जाएं…
Read More