संपादकीय – हिंदी की गूँज

धीरे-धीरे संभलने का वक्त आया है धीरे-धीरे सुधरने का वक्त आया है पिछले दो वर्षों में बहुत कुछ बदल गया | हम बदल गए ,हमारे सोचने का नजरिया बदल गया | पूरी दुनिया में एक भूचाल सा आ गया जिसके कारण कई लोग टूटे ,कई लोग बिखरे ,कई लोग बदले ,कई लोग सँवरे,कई लोग सुधरे और जो नहीं सुधरे वो मरे | कोरोना वायरस जब से आया तब से दुनिया में लोगों ने अपनी पहली चर्चा में इसे ही रखा | दूसरी कोई भी चर्चा प्राथमिकता में पीछे ही रही |  न केवल…

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अपनी बात

इस वर्ष भी हिंदी दिवस बीत गया | हर वर्ष हिंदी दिवस आता है ,हिंदी के लोग पखवाड़े में जागरूक होते हैं। राजभाषा अधिकारियों की सक्रियता देखने लायक होती है। सरकारी संस्थानों में हिंदी के नाम पर कवि सम्मलेन, काव्य-गोष्ठी, काव्य-प्रतियोगिता, वाद-विवाद प्रतियोगिता इत्यादि का आयोजन किया जाता है।  उत्सव में उल्लास भी दिखाई देता है और कहीं-कहीं मज़बूरी भी।  मज़बूरी का मै कतई समर्थन नहीं करती लेकिन ये एक दिन का उल्लास भी मुझे खटकता है। मैं उल्लास के पक्ष में तो हूँ लेकिन एक दिन के इस उल्लास से हिंदी का कितना भला हो सकता है?…

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संपादकीय

आज सारी दुनिया में कोलाहल मचा है | एक वायरस ने सभी को यह सोचने पर विवश कर दिया है कि जीवन का सुख क्या है ? पैसा कमाने और जुटाने की जद्दोजहद में भाग रहे आदमी को अब समझ में आ रहा है कि जीवन की आवश्यकताएँ कितनी सीमित हैं | भीड़ का चेहरा बने हुए सेलेब्रेटी को आज भीड़ से ही डर लग रहा है | यह कोई वायरस हो या  कोई जैविक हथियार हो या किसी तरह की प्राकृतिक आपदा | एक बात तय है इस वायरस में…

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