इस वर्ष भी हिंदी दिवस बीत गया | हर वर्ष हिंदी दिवस आता है ,हिंदी के लोग पखवाड़े में जागरूक होते हैं। राजभाषा अधिकारियों की सक्रियता देखने लायक होती है। सरकारी संस्थानों में हिंदी के नाम पर कवि सम्मलेन, काव्य-गोष्ठी, काव्य-प्रतियोगिता, वाद-विवाद प्रतियोगिता इत्यादि का आयोजन किया जाता है। उत्सव में उल्लास भी दिखाई देता है और कहीं-कहीं मज़बूरी भी। मज़बूरी का मै कतई समर्थन नहीं करती लेकिन ये एक दिन का उल्लास भी मुझे खटकता है। मैं उल्लास के पक्ष में तो हूँ लेकिन एक दिन के इस उल्लास से हिंदी का कितना भला हो सकता है? यह विचार करने योग्य है। राजभाषा से आगे हिंदी क्यों नहीं बढ़ पा रही है? इसमें किसका दोष है? हिंदी विश्व में बड़े व्यापक पैमाने पर बोली जाती है,भारत में सबसे ज्यादा बोली जाने वाले भाषा है। साहित्यकार और फिल्म इंडस्ट्री ने भी हिंदी के प्रचार -प्रसार में खूब भूमिका निभाई और निभा रहे हैं फिर भी आज हिंदी उपेक्षित क्यों है?
यह प्रश्न विशेषकर उन लोगों से है जो पढ़ लिख कर किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी में नौकरी कर रहे हैं। यह प्रश्न सरकारों से हैं जिनके पास तमाम फिजूल के मुद्दे हैं लेकिन हिंदी पर चर्चा करना उपयुक्त नहीं समझते। अन्य सभी भाषाओँ का स्वागत है,हम किसी भाषा का विरोध नहीं करते लेकिन भारत ही पहचान जिस भाषा से है वो हिंदी है,उसका सम्मान और उसका हक़ बहुत जरुरी है। अन्य देशों से सीख लेकर भी हम इस दिशा में उपयुक्त कार्य कर सकते हैं लेकिन सीखने को कौन कहे हमारी नयी पीढ़ी के अधिकतर लोगों को हिंदी में आपस में बात करने में झिझक महसूस होती है। हिंदी बड़े-बड़े शोधों से नहीं मजबूत होगी, हिंदी बड़ी-बड़ी किताबों से नहीं मजबूत होगी,हिंदी राजभाषा दिवस पर किये गए एकदिवसीय कार्यक्रमों से नहीं मजबूत होगी। हिंदी को मजबूत करना है तो जनमानस में इसका बढ़ावा जरुरी है। लोग भले की कई भाषाओँ के ज्ञाता हों लेकिन कम से कम हर भारतीय आपस में हिंदी में बातचीत करे और गर्व महसूस करे। टेक्नॉलजी की भी इस विषय में महत्वपूर्ण भूमिका है। जहाँ-जहाँ अंग्रेजी की निर्भरता है वहाँ रिसर्च और अनुसन्धान की आवश्यकता है ताकि हम हिंदी का प्रयोग इंटरनेट और कंप्यूटर के साथ भी खूब कर सकें।
वैश्विक स्तर पर भी हिंदी को बढ़ावा देने की आवश्यकता है जिसमें सरकार का महत्वपूर्ण योगदान होना चाहिए। हिंदी दिवस की सार्थकता तभी है जब दैनिक जीवन के हर क्षेत्र में हिंदी का उपयोग धड़ल्ले से हो। हर भारतीय हिंदी में बात करने में सम्मान महसूस करें। कान्वेंट स्कूल के बच्चों को अंग्रेजी के साथ-साथ हिंदी की व्यवस्थित ट्रेनिंग दी जाय और समय-समय पर हिंदी में शोध कार्य करने वाले विद्वानों को पुरस्कृत किया जाय ताकि शोध में भी बढ़ावा मिले।
हिंदी की गूँज का भी यही उद्देश्य है कि हिंदी पूरे विश्व में फैले। भारत से दूर रहने वाले हर भारतीय हिंदी के फूलों को अपने ह्रदय में लेकर अपने आस-पास खुश्बू फैलाता रहे। जुलाई से सितम्बर अंक को आप सभी का बहुत प्यार मिला। मुझे उम्मीद है इस आगामी अंक को भी आपका बहुत प्यार मिलेगा।
आभार
रमा शर्मा
मुख्य संपादक
हिंदी की गूँज