ग़ज़ल

पांव पड़कर मौलवी और पादरी के।

लिख रहें हैं हर्फ़ इंग्लिश फ़ारसी के।

 

छुप गया सूरज घने इन बादलों में,

खोखले वादे किये क्यों रोशनी के।

 

झोंपड़ी में ये अना मर जायेगी फिर,

दिन बहुत अच्छे लगेंगे तीरगी के।

 

इश्क़! इतना सोचकर मुझको बता तू,

इम्तिहां कितने हुए पाकीज़गी के।

 

जड़ दरख्तों की हिला सकते नहीं तुम

जब तलक दुश्मन न हों अपने उसी के।

 

शौक़ से पीता नहीं तो क्या मैं करता,

ज़ह्र में कुछ पल मिले उसकी ख़ुशी के।

 

वो नदी है तू नदी है ख़ास लेकिन,

जानता हूँ कितने ही किस्से नदी के।

 

  • विनोद सिंह नामदेव

“शजर” शिवपुरी मध्यप्रदेश

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