बताओ कौन किसे आसमान देता है। परों को काट के मुझको उड़ान देता है। ज़मीं नहीं है तो क्या घर बनायें जन्नत में सुना है सबके लिये वो मकान देता है। ज़ुबाँ दबी है मेरे दोस्तो मगर इक दिन नसीब गूंगे को उसकी ज़बान देता है। ग़मों के शह्र में होता है इक तमाशा ही कहाँ मुझे कोई अम्नो अमान देता है। नहीं है शर्म उसे जाने कितने मंचों से, हया बचाने के झूठे बयान देता है। पता नहीं था ख़ुदा आज ये मालूम हुआ,…
Read MoreTag: विनोद सिंह नामदेव
ग़ज़ल
पांव पड़कर मौलवी और पादरी के। लिख रहें हैं हर्फ़ इंग्लिश फ़ारसी के। छुप गया सूरज घने इन बादलों में, खोखले वादे किये क्यों रोशनी के। झोंपड़ी में ये अना मर जायेगी फिर, दिन बहुत अच्छे लगेंगे तीरगी के। इश्क़! इतना सोचकर मुझको बता तू, इम्तिहां कितने हुए पाकीज़गी के। जड़ दरख्तों की हिला सकते नहीं तुम जब तलक दुश्मन न हों अपने उसी के। शौक़ से पीता नहीं तो क्या मैं करता, ज़ह्र में कुछ पल मिले उसकी ख़ुशी के। वो नदी है…
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