इस शहर में काम,काम औऱ काम काम के बोझ से लदपद मै सुबह,दोपहर, शाम। बिजली की चौन्ध में दमदमाती वो शाम नींद के झटकों से उलझी रात और उस रात के आग़ोश से खोये अनगिनत तारे जिनसे बेख़बर हुआ मैं बुजर्गों से सुने थे जिनके किस्से । कभी कभी सोचता हूँ उन्ही किस्सों की घनेरी, अंधेरी रात के बारे में क्यूँ नजराया सितारों का जमघट और वो चाँद का हाशिया इस शहर में। इंजनों की काली स्याह से रचता दिन गर्मचारकोल की चिपचिपाहट से सुरबद्ध बेढंगे संगीत के शोर…
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राकेश छोकर की कवितायें
फिर से राजतिलक कर दो अखंड भारत के वीर सपूतों शौर्य गाथाओं के शिल्पकारों अश्व मेध के बुंदेलों युद्धाभिषेक करो तिरंगे को प्रणाम कर मृत्युन्जय आवेग का कर वरण प्रतिकार की क्रोधाग्नि से शत्रुओं के अत्याचार पर अभिमन्यु सा वार कर वज्रघाती पैगाम दो राष्ट्र के हो अभिमान तुम अर्जुन सरीखे रणबांकुर भीष्म प्रतिज्ञा लो माँ के यशोगान को प्राणों के अभिदान से किस्से क्रान्ति के फिर से गुंजायेमान करो मत अब अभयदान दो अनुपम शौर्य गाथा तुम्हारी चंदन तिलक सा मान धरो तुम्हारे रक्त का कण कण समर्पित…
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