कविता क्यों लिखती हूँ

यह काल जैसे  प्रसव पीड़ा का हैँ… तन और मन को झकझोर कर रख देने वाली प्रसव वेदना… *शायद कुछ नया जन्म लेने वाला हैँ…* वो वेदना,  जो अपनों ने दीं…. समाज ने,  वक़्त ने… वह वेदना प्रसव वेदना सी ही…. मुझे कलपा रही हैँ . शरीर का रेशा रेशा चीख रहा हैँ नस- नस, पोर – पोर तिड़क रहा हैँ ज़ेहन में हर तंतु मथ रहा हैँ माथे की नस तनते-तनते फटने को हैँ कसती,  ढीली होती हुई ऱगे दर्द से चीत्कारती साँसे , मुट्ठी कसते  हाथ,  कसमसाता,  उबलता…

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