डॉ जयप्रकाश मिश्र की कवितायें

मन से बचपन नहीं गया है    असली के चक्कर में नकली माल बाँधकर घर को लाते । छायी देख सफेदी ऊपर लोग हमेशा शीश झुकाते ॥   सेविंग कर गालों पर अपने महंगे -महंगे लेप सजाते । हैं तो नकली फिर भी अपने बिन बोले ही दाँत दिखाते , गंजे सिर के ऊपर अक्सर काला -काला रंग लगाते । ।   तन से उम्र ढली है लेकिन मन से बचपन नहीं गया है । बनकर घूमे छैलबिहारी , मानो यौवन नया -नया है । युवती के सिर अपने दोनों…

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