मेरे सपनों का भारत सुंदर और सलोना हो, उत्तर से दक्षिण तक महकता हर कोना हो। सभी के आँगन में उन्नति की सुनाई दे गूँज, देश में न कोई निर्धन, न किसी का रोना हो।। जातीयता मज़हब का न अनर्गल प्रलाप हो, हर बच्चे को श्रेष्ठ शिक्षा पाने का हिसाब हो। बेटा बेटी में न कहीं कोई भी न ही विभेद करे, विषता कटुता का दिलों में न बहता श्राप हो।। पढ़े लिखे नवयुवकों को कहीं रोज़गार मिले, प्रत्येक व्यक्ति के चेहरे पर सदा मुस्कान खिले। किसी के…
Read MoreCategory: कविता
पर्यावरण बचाओ
भारी संकट आन पड़ा है, धरती कौन बचायेगा। मानवता का नाम निशां तब, पृथ्वी से मिट जायेगा।1 बढ़ा प्रदूषण धरती पर यूं, जनता सारी त्रस्त हुई। महामारियां जन्म ले रहीं, मानव क्या बच पायेगा।2 नंगी होती धरा नित्य दिन, पर्वत जंगल का हो विनाश। खातिर आने वाली पीढ़ी , पादप कौन लगायेगा।3 ग्रसित दिशाएँ धूल गर्द से, लेना सांस हुआ भारी। पीकर रोज विषैली गैसें, कैसे स्वास्थ्य बनायेगा।4 बन अज्ञानी नाश कर रहे, भूमंडल की थाती को। पर्यावरण बचाएं कैसे, आखिर कौन बतायेगा।5 जिधर नज़र जाती है दिखता, ढेर प्लास्टिक…
Read Moreदो टूक कहो
मुँह पर ताला क्या मजबूरी, खुलकर बोलो यार मुंगेरी। जोड़ घटा का वक्त नहीं है, सही गलत का भेद जरूरी। सच को सच कहने का ज़ज्बा, और झूठ को झूठ कहो। किससे डरना क्योंकर डरना, सही बात दो टूक कहो। मौन स्वीकृति और समर्थन, दिखला रहा प्रेम प्रदर्शन। चेहरे की धुँधली रेखाएँ, दिखला देगा उजला दर्पण। आँख के आंसू सूख न जायें, शिथिल न हों कोमल स्पंदन। निहित स्वार्थ की कारा तोड़ो, झूठमूठ के सारे बंधन। कलमकार का फर्ज़ यही है, सच को केवल सच बतलायें। गहन तिमिर का मंथन…
Read Moreफूँक दी फुलवारियाँ
डाल कोरोना कसाई , फूस में चिंगारियाँ , चीन के सौदागरों ने , फूँक दी फुलवारियाँ । विश्व सहमा सा अचानक , मौन है आलोचना , मूँदकर आँखें सियासी , सो गई संवेदना । लाकडाउन में फँसी है ,अर्थ की मादक बहारें , भूख पर पड़ती दया के , बर्फ की ठंडी फुहारें । काँपती अनजान भय से , ट्रंप की लाचारियाँ । चीन के सौदागरों ने , फूँक दी फुलवारियाँ । फ्रांस भी कुंठित हुआ अब ,कष्ट में जापान है , हाथ में काला कटोरा…
Read Moreराज की बात
शहर के तपते प्रहर में, छांव देता कौन किसको। शक के घेरे घूरते है, ठाँव देता कौन किसको नीर निर्मल,पीर उज्ज्वल, नीड़ स्वर्णिम पांव जिसको। संग मेरे चल के देखो, देखना है गांव जिसको। दिल की बातें थी बताई, मानकर हमराज जिसको। तीर उसने ही चलाई, क्या बताये और किसको। राज रखना दर्द अपने, मुक्त कर दो तुम खुशी को। चाह गर हमदर्द की है, भूल जाना बेबसी को । चार दिन की जिन्दगी में, थे सुने छल-छिद्र जिसको, रेत मुट्ठी के थे सारे, रख न पाए पास…
Read Moreचंदा की चांदनी
बहुत लंबी रात है ,चाँद भी कुछ हमारे साथ है बैठे है उनके आगोश में , न जाने कब उनसे मुलाकात हो । गुलज़ार सा हो गया अम्बर आज , कहि नूर न चुरा ले ये जनाब , बैठे है इंतज़ार में, इस बादल की छाव में, तारे सिमट के आ गए , आज सारे इस संसार मैं । क्यों न इतराउ मे , क्यों न शर्माउ में, खुबसुरती की इस चादर में ,क्यों न गुम हो जाओ में । दाग है तुझमे फिर भी ,नाप न पाया तेरी खूबसूरती…
Read Moreराकेश छोकर की कवितायें
फिर से राजतिलक कर दो अखंड भारत के वीर सपूतों शौर्य गाथाओं के शिल्पकारों अश्व मेध के बुंदेलों युद्धाभिषेक करो तिरंगे को प्रणाम कर मृत्युन्जय आवेग का कर वरण प्रतिकार की क्रोधाग्नि से शत्रुओं के अत्याचार पर अभिमन्यु सा वार कर वज्रघाती पैगाम दो राष्ट्र के हो अभिमान तुम अर्जुन सरीखे रणबांकुर भीष्म प्रतिज्ञा लो माँ के यशोगान को प्राणों के अभिदान से किस्से क्रान्ति के फिर से गुंजायेमान करो मत अब अभयदान दो अनुपम शौर्य गाथा तुम्हारी चंदन तिलक सा मान धरो तुम्हारे रक्त का कण कण समर्पित…
Read More