मुआवजा

भुखमरी से मौत की खबर निरी अफवाह के सिवा कुछ नहीं लगती थी। खाद्यमंत्री ने पिछले सत्र में सदन के समक्ष रिकार्ड तोड़ खाद्यान्‍न होने की घोषणा की थी। विरोधी दलों का दुष्‍प्रचार या शरारती तत्‍वों की खुराफात भी हो सकती है। आज के जमाने में भूख से कौन मरता है? जरा सी मेहनत करके कमाया-खाया जा सकता है। काम करने वालों के लिए काम की कमी नहीं है। मरियल से मरियल रिक्‍शे वाले तक कमा-खा रहे हैं। चुनाव सर पर था। विधायक जी यहॉं से लगातार दो बार चुने…

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भिखारी

हाथ में लेकर कटोरा,मांगता वह भीख है। भूख से लाचार दिखता,दे रहा कुछ सीख है।। कह रहा कुछ भी कहाँ वह,बस रहा वह चीख है। बस उदर की तृप्ति खातिर,कर रहा वह कीक है।।   फट गये परिधान उसके,गंदगी की छींट है। उठ रही दुर्गन्ध तन से,पर जमा वह ढीठ है ।। रंग काला हो गया है, आँख उसकी पीत है। देह में हड्डी बची बस,पेट में ही पीठ है।।   रोटियों की याचना में ,डालता वह दीठ है। गर न मिलती रोटियाँ है, वह सुनाता झीख है।। नहीं चहिए…

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ग़ज़ल

जब भी हयात आब को बिसयार देती है माँ की दुआ इलाह को ललकार देती है   रुलाये ख़्वाब भी ना कोई उसके बच्चे को जब माँ सुलाती है तो वो, थुथकार देती है   पल भर में भूल जाता है वो अपने दर्द को माँ देख कर यूँ बच्चे को पुचकार देती है बेरोज़गारी तो यूँ ही बदनाम फिरती है फिलहाल रोजगार भी अफ़कार देती है   कुर्सी के आस-पास अगर पहुँचे अर्ज़ियाँ तो मेज पे दबा भी ये सरकार देती है   ~ तान्या सिंह गोरखपुर, उत्तर-प्रदेश  

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ग़ज़ल

चाहे अब बेशक़ सताएँ ग़म किसी भी तौर पर टूटने देंगे न ख़ुदको हम किसी भी तौर पर   एक ठोकर भी जरूरी है सँभलने के लिए मत मनाओ हार का मातम किसी भी तौर पर   मुस्कुराकर सामना करते रहो हालात का आँखों को करना न हरगिज़ नम किसी भी तौर पर   ज़िंदगी है नाव तो पतवार है इसकी यही खोने मत देना यहाँ संयम किसी भी तौर पर   हम सृजन के बीज हैं अंकुर हमें कहते हैं सब आँकना हरगिज़ न हमको कम किसी भी तौर…

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ग़ज़ल

पाने की आरज़ू थी उसे,  अब नहीं रही ख़ुशियों भरे वो दिन वो हसीं शब नहीं रही जाने हुआ है क्या कि मेरा  प्यार खो गया मैं भी, अगरचे, पहले थी जो अब नहीं रही क़िस्मत से लड़ रही हूँ, शिकायत कभी न की दुश्वारी आदमी को भला कब नहीं रही रखती नहीं ज़ियादा उमीदें किसी से मैं तुझ से भी कुछ तवक्को, मेरे रब, नहीं रही (तवक्को = आशा) हसरत, न आरज़ू, न तमन्ना, न जुस्तजू मन में किसी की ‘कामना’ ही अब नहीं रही   कामना मिश्रा दिल्ली,…

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गजल

ख़ुद ही रोयें, ख़ुद मुस्काने लगते हैं इश्क़ में डूबे लोग दिवाने लगते हैं चार ही लोगों का क़िस्सा है सारे दिन जब चाहे तब बात बनाने लगते हैं आकर बैठो पास मेरे और सुन लो तुम कैसे-कैसे ख़्वाब सताने लगते हैं जगते हैं दिन रात न जाने क्यों ये लोग मुझको तो ये लोग दिवाने लगते हैं तेरे प्यार में पड़कर हमने ये जाना ख़ुश होकर क्यों अश्क बहाने लगते हैं रूप बदल लेने से आख़िर क्या होगा रंग असल ही लोग दिखाने लगते हैं रिश्तों पर पैसे ने…

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कविता क्यों लिखती हूँ

यह काल जैसे  प्रसव पीड़ा का हैँ… तन और मन को झकझोर कर रख देने वाली प्रसव वेदना… *शायद कुछ नया जन्म लेने वाला हैँ…* वो वेदना,  जो अपनों ने दीं…. समाज ने,  वक़्त ने… वह वेदना प्रसव वेदना सी ही…. मुझे कलपा रही हैँ . शरीर का रेशा रेशा चीख रहा हैँ नस- नस, पोर – पोर तिड़क रहा हैँ ज़ेहन में हर तंतु मथ रहा हैँ माथे की नस तनते-तनते फटने को हैँ कसती,  ढीली होती हुई ऱगे दर्द से चीत्कारती साँसे , मुट्ठी कसते  हाथ,  कसमसाता,  उबलता…

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राकेश छोकर की कवितायें

इस शहर में   काम,काम औऱ काम काम के बोझ से लदपद मै सुबह,दोपहर, शाम। बिजली की चौन्ध में दमदमाती वो शाम नींद के झटकों से उलझी रात और उस रात के आग़ोश से खोये अनगिनत तारे जिनसे बेख़बर हुआ मैं बुजर्गों से सुने थे जिनके किस्से । कभी कभी सोचता हूँ उन्ही किस्सों की घनेरी, अंधेरी रात के बारे में क्यूँ नजराया सितारों का जमघट और वो चाँद का हाशिया इस शहर में। इंजनों की काली स्याह से रचता दिन गर्मचारकोल की चिपचिपाहट से सुरबद्ध बेढंगे संगीत के शोर…

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मेरे सपनों का भारत…

मेरे सपनों का भारत सुंदर और  सलोना हो, उत्तर से दक्षिण तक  महकता हर  कोना हो। सभी के  आँगन में उन्नति की  सुनाई दे  गूँज, देश में न कोई निर्धन, न किसी  का रोना हो।।   जातीयता मज़हब का न अनर्गल  प्रलाप हो, हर बच्चे को श्रेष्ठ शिक्षा पाने का हिसाब हो। बेटा बेटी में न कहीं कोई भी न ही विभेद करे, विषता कटुता का दिलों में न बहता श्राप हो।।   पढ़े  लिखे नवयुवकों को  कहीं रोज़गार मिले, प्रत्येक व्यक्ति के चेहरे पर सदा मुस्कान खिले। किसी के…

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