मेहबूबा

‘चलिए, जल्दी कीजिए, गाड़ी का समय हो गया है। आपका सामान चेक करके चढ़ना। वापिस लौटकर आना मिले भी या नहीं भी।गाँव के जो भी लोग मिले उसे यह बता देना।’ कहते हुए स्टेशन मास्टर रेल के स्टेशन पर दौड़ रहे थे। हिंदुस्तान से पाकिस्तान ट्रेन जा रही थीं।ये बात है 1948 के अगस्त माह की, जब भारत दो टूकडों में बँट रहा था। हिंदुस्तान और पातिस्तान के बीच रेखांकन करनेवाले ने दोनों देश की भौगोलिक स्थिति को बिना जाने ही रेखा खींच दी थीं। यह बात उस गाँव की…

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धारा के विपरीत उतरना है

आओ साथी करें मरम्मत नाव की धारा के विपरीत उतरना है l   गड़बड़ मौसम,तेज़ आधियाँ टूटी है पतवार फ़ँसे हुए हैं इस तट पर जाना होगा उस पार मन में संशय पैदा करती हैं ऊँची लहरें किन्तु लक्ष्य से पूर्व कहो कब पथिक कहीं ठहरे   आधे रस्ते में रुकना स्वीकार नहीं अंतिम साँस तलक दम भरना है ll     माना लोग डराएंगे पर हमें नहीं डरना नकारात्मक होकर के बिन मौत नहीं मरना मौसम सदा नहीं रहता है यूँ बिगड़ा-बिगड़ा इच्छाशक्ति के आगे तूफान करेगा क्या  …

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श्रमिक

जेठ की तपती दुपहरी पूस की बर्फ़ीली रातें कोई भी मौसम होता श्रमिक कभी नहीं सोता   हाड़तोड़ करता परिश्रम न शिकायत न कोई गम सन्तोषी रहता सदा ही राम जप कहता सदा ही   ईमान का पक्का श्रमिक इरादों से डिगे न तनिक काम कैसा भी हो कठिन उत्साह नहीं होता मलिन   तन से निकला जो पसीना धरती उगले उससे सोना उपजाऊ बनाता कभी वह ठोकता मंजिल कभी वह   डॉ0निर्मला शर्मा दौसा राजस्थान

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हारने से पहले

टिप….टिप…. टिप…..टपकती हुई गुल्कोज की बूंदें पिछले चार दिनों से लगातार मेरे शरीर में प्रवेश कर रही थी। इसके अलावा जाने कितनी दवाइयां, इंजेक्शन, विटामिन, प्रोटिन मेरे शरीर में जा रहे थे पर शरीर पर इनका कोई असर महसूस नहीं हो रहा था। बैचैन मन , अशक्त शरीर, उबाऊ दिनचर्या, गमगीन माहौल जीवन को निरन्तर मौत की ओर धकेल रहे थे। पी पी कीट पहने डॉक्टर…. नर्स…. और वार्ड बॉय….इस तनाव , उदासी को कम  करने में असमर्थ लग रहे थे। चारों ओर शोक ही शोक पसरा था। जाने कितने…

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संपादकीय – हिंदी की गूँज

धीरे-धीरे संभलने का वक्त आया है धीरे-धीरे सुधरने का वक्त आया है पिछले दो वर्षों में बहुत कुछ बदल गया | हम बदल गए ,हमारे सोचने का नजरिया बदल गया | पूरी दुनिया में एक भूचाल सा आ गया जिसके कारण कई लोग टूटे ,कई लोग बिखरे ,कई लोग बदले ,कई लोग सँवरे,कई लोग सुधरे और जो नहीं सुधरे वो मरे | कोरोना वायरस जब से आया तब से दुनिया में लोगों ने अपनी पहली चर्चा में इसे ही रखा | दूसरी कोई भी चर्चा प्राथमिकता में पीछे ही रही |  न केवल…

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सम्पादकीय

एक सामान्य मनुष्य के लिए जीवन में केवल भौतिक सुख की प्राप्ति ही सम्पूर्ण हैं जबकि असाधारण व्यक्तित्व के भौतिक सुख बहुत मायने नहीं रखता है | वो स्वयं को संतुष्ट और संतुलित रखने का प्रयास करते हैं | जीवन के हर चरण में और प्राप्ति के हर स्तर पर वो अपने आप को संतुष्ट रखने है | वास्तव में यही आत्मा को संतुष्ट रखने का सबसे बड़ा मन्त्र है | भौतिक सुख की कामना करने वाले व्यक्ति महसूस करते होंगे की उनके जीवन में संतुष्टि नहीं आ पाती क्योंकि…

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साथी

पति की असामयिक मृत्यु के कारण रामकली के आर्थिक हालात बहुत खराब हो गए थे| जो मजदूरी करके कमा खा लेती थी वो काम धंधा भी लॉकडाउन के कारण कभी कभार ही मिलता था जिससे कभी सूखी रोटी और कभी रुखे चावलों का जुगाड़ हो जाता था| इतने पर भी उसका भगवान पर विश्वास रत्ती भर भी कम नही हुआ था और वह सबकी मदद को हमेशा तैयार रहती थी| अभी कल की ही बात है काम से लौटते वक्त सड़क पर एक बेहोश आदमी पड़ा मिल गया| पहले तो…

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डॉ जयप्रकाश मिश्र की कवितायें

मन से बचपन नहीं गया है    असली के चक्कर में नकली माल बाँधकर घर को लाते । छायी देख सफेदी ऊपर लोग हमेशा शीश झुकाते ॥   सेविंग कर गालों पर अपने महंगे -महंगे लेप सजाते । हैं तो नकली फिर भी अपने बिन बोले ही दाँत दिखाते , गंजे सिर के ऊपर अक्सर काला -काला रंग लगाते । ।   तन से उम्र ढली है लेकिन मन से बचपन नहीं गया है । बनकर घूमे छैलबिहारी , मानो यौवन नया -नया है । युवती के सिर अपने दोनों…

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माँ की सीख

दुल्हन के लिबास में लिपटी सिमटी-सकुचाई वसुधा को ,ससुराल विदा होते समय उसकी माँ ने एक गुरु मंत्र दिया – ” बेटा यह सृष्टि का अटल सत्य है कि विवाहोपरांत ससुराल की हर लड़की का असल घर होता है। जीवन में कभी किसी की बात बुरी लगे, फिर चाहे सामने वाला कितना भी गलत क्यों ना हो ? या किसी का व्यवहार तुम्हारे प्रति रुखा हो , तुम कभी पलट कर उसे जवाब या बहस मत करना । ‘सबसे भली चुप ‘ ! इस मंत्र को यदि साध लोगी तो…

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नया वर्ष और हम

नया वर्ष नयी उम्मीदों को लेकर आया है। वो सारी उम्मीदें जो 2020 में डगमगायी थी उन्हें अब रास्ता मिलने की सम्भावना है। उम्मीदों और विचारों का बड़ा गहरा सम्बन्ध है। सकारात्मक विचार ,उम्मीदों को और मजबूत बनाते हैं और सकारात्मक विचार आत्मा की शुद्धता से मस्तिष्क में प्रवाहित होते हैं। यही हमें दृढ़ बनाते हैं।  पिछले वर्ष तमाम आशंकाओं के बीच भी हिंदी और साहित्य के प्रवाह में कमी नहीं आयी।  हमने साहित्य और तकनीकी का समन्वय देखा ,हमने कविता और सोशल मीडिया का समन्वय देखा। प्रवासी साहित्यकारों और भारतीय रचनाकारों का मिलाजुला जबरदस्त प्रयास देखा…

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