पावस ऋतु भीगे गाँव हमारे भीगे चौबारे * सावन झूला रिमझिम बुंदियाँ झूलें गुइंयाँ * मेघ सींचते प्रकृति और प्यार राग मल्हार * बदरवा में बिजुरी चमचम धमकधम * रजनीगन्धा महके रातरानी जूही दिवानी * शेफाली गुच्छ खिल उठते सुन रागश्री धुन – नीलम वर्मा
Read MoreDay: September 1, 2023
फिर कब आओगे ?
मन के रसिक बोलो तो सही ,फिर कब आओगे ? अभी तक तुमसे मिल भी नहीं सका था तेरा मुखड़ा भी नहीं देख सका था दिल की बात भी नहीं कह सका था । सोते हुये मुझको चुंबन से , फिर कब जगाओगे ? मन के रसिक बोलो तो सही ,फिर कब आओगे ? दुनिया की नजरों मे जो कुछ भी मेरा है । तुम्हारे बिना सब कुछ आधा – अधूरा है । अभी तो तुम आए थे मन से मन को आत्मसात भी नहीं कर सका था…
Read Moreतुम ! तुम ही हो
रच बस गया है तेरा प्यार मेंहदी सा मेरे तन मन मे अनचाहे , अनायास बेवक्त बेहिसाब । सौम्य , शीतल शांत सिंदूरी आभा जो घिर आई है रह रहकर लहराते केसों के कहर से अनभिज्ञ अविचल व प्रेरक । मुस्कुराहट जो दे जाती है आमंत्रण आलिंगन का बेसब्री का सबूत चाहत का रंग और पता नहीं क्या क्या । सँजो सजाकर रख लिया हूँ उन लमहों के लिए जब दर्दे जिगर होगा और होगा विरह व तनहा एकांत । उसकी वह खुसबू जो मड़राती रहती…
Read Moreअनमना
ऐ समय की वेदिकाओं लो हृदय का दंश देखो, गुप्त पर संवेत होते सूर्य का विध्वंस देखो। राधिका को देखने का है मिला सौभाग्य तुमको, कृष्ण का छलिया बदन बेशक किया था त्याग तुमको। तुम विरह को मानते हो तुम व्यथा को जानते हो, तुम चराचर के सुलगते राग को पहचानते हो। प्रेम एक है राधिका का और मीरा चाहती है, जो यशोदा का परम है पुतना भी पा सकी है। चाह कर ना पा सका खोता गया एहसास तुमसे, द्वेष में ब्रजधाम का फिर क्यूं…
Read Moreबौद्ध कालीन भाषिक परिवेश एवं भाषागत विविधताएं
शोध सारांशिका-भाषा किसी भी कालखंड में किसी भी समाज के द्वारा विचारों के आदान-प्रदान का एक सशक्त साधन है । जब हम अपनी अभिव्यक्ति यों को समृद्ध करते हुए अनुभूति को उसमें समाहित कर के जनसामान्य तक अपनी बात पहुंचाना चाहते हैं, तो उसके लिए भाषा अत्यंत प्रभावशाली माध्यम माना जाता है । हमारे द्वारा अपनाए गए शब्द हमारा परिचय और हमारा पहचान देते हैं। हम यह मानते हैं कि भाषा के द्वारा ही किसी भी कालखंड की परंपराओं को रीति रिवाज को मान्यताओं को जाना जा सकता है, पहचाना…
Read Moreनातेदार
आफिस का कार्य खत्म हो गया था दिव्यांश वापसी के लिए मुम्बई से दिल्ली आने की तैयारी करने लगा। प्रातः 5.45 पर मुम्बई वी.टी. से ट्रेन पकड़नी थी। होटल मैनेजर से ज्ञात हुआ कि सुबह 6 बजे के बाद ही आटो या टैक्सी रेलवे स्टेशन तक जाने के लिए मिलेगी। काफी सोच-विचार करने के बाद दिव्यांश ने निर्णय लिया कि अगर वह रात में ही रेलवे स्टेशन चला जाए तो बेहतर रहेगा। सारा सामान लेकर वह स्टेशन पर आ गया। वेटिंग रूम में पहुँचने पर वेंटिग रूम के इंचार्ज ने…
Read Moreडाइरी के पन्नों से
तकरीबन 15 रोज हो गए हमारे बीच कोई बातचीत नहीं हुई,यूँ तो ज़िंदगी ऊपर से बिलकुल सहज है मगर अंदर बहुत कुछ दरक गया है…..16 साल….एक युग कहलाता है…..इन 16 सालों में क्या क्या नही गुज़र गया….अब तो बच्चे भी बड़े हो गए हैं।तुमने एक बार कहा तो होता कि तुम्हारी ज़िंदगी में कोई धीरे धीरे मेरी जगह ले रहा है। ऐसी क्या कमी थी मेरे प्यार,विश्वास एउम समर्पण में….गर सोचने बैठू तो दिमाग की नसें फटने लगती हैं। उफ कितनी शातिरता से तुम दोनों तरफ रिश्ते निभाते रहे…किसी को…
Read Moreदरकता अमेरिकी लोकतंत्र और भारत की उम्मीदें
( भविष्य में भारत- अमेरिका संबंध बिडेन प्रशासन के तहत कैसे रहेंगे ये अभी भविष्य के गर्त में है.भारत को संवेदनशील मुद्दों पर कड़ी बातचीत करने के लिए तैयार रहना चाहिए। कोविद-19 संक्रमणों के नियंत्रण और आर्थिक सुधार के साथ संयुक्त, अमेरिका फिर से वैश्विक अर्थव्यवस्था को एक विकास प्रदान कर सकता है. भारत जैसे देशों को अपने निर्यात को बढ़ावा देने और बढ़ने की आवश्यकता है. नए दौर में दोनों देशों को सामरिक आयाम के साथ आर्थिक और वाणिज्यिक आयाम को अधिक प्राथमिकता के साथ व्यवहार करना चाहिए )…
Read Moreग़ज़ल
लगता नहीं है दिल कहीं तेरे जहान में। तुझको पुकारूं रात दिन अपनी अज़ान में।। बेबस हुआ है बाप ,बुढ़ापा बिगड़ गया, बहुएँ लड़ें हैं घर में , तो बेटे दुकान में। जख़्मी हुई है ज़िंदगी हर सांस पर यहाँ, तूने चढ़ाये तीर थे कितने कमान में। चाँदी सभी ने बाँट ली,सोना बँटा सभी तस्वीर छोड़ी बाप की उजड़े मकान में। चहरा बुझा-बुझा हुआ, आँखे उदास हैं, क्या ज़िंदगी ये आ गई अपनी ढलान में। हमने बुलाया जो उन्हें पढ़ने कलाम इक, आधी घड़ी…
Read Moreगीत
भर रहा है समय प्राण में गीत को, भूल कर वेदना साध संगीत को। भोर का शीश है रेत के पाँव में , गंध सौंधी उड़े खेत में गाँव में। खग सभी कोटरों से निकलने लगे, खोल कर पँख वे फिर मचलने लगे। फाँदने वे लगे दर्द की भीत को।। भर रहा है समय प्राण में…. खेजड़ी के तले चाँद क्यूँ रुक गया। ये गगन भी धरा की तरफ़ झुक गया मंद सी पड़ गई साँझ की वात भी केसरी-केसरी घुल रही रात भी बात मन की कहो आज…
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