ऐ समय की वेदिकाओं
लो हृदय का दंश देखो,
गुप्त पर संवेत होते
सूर्य का विध्वंस देखो।
राधिका को देखने का
है मिला सौभाग्य तुमको,
कृष्ण का छलिया बदन
बेशक किया था त्याग तुमको।
तुम विरह को मानते हो
तुम व्यथा को जानते हो,
तुम चराचर के सुलगते
राग को पहचानते हो।
प्रेम एक है राधिका का
और मीरा चाहती है,
जो यशोदा का परम है
पुतना भी पा सकी है।
चाह कर ना पा सका
खोता गया एहसास तुमसे,
द्वेष में ब्रजधाम का फिर
क्यूं बना इतिहास तुमसे।
मैं समझता हूं उफनता
स्नेह जो देखा है कल,
मंद पड़ती रूक सी जाती
किस तरह यमुना का जल।
साक्ष्य रख अनुभूतियों को
और बींधा हंस देखो ,
ऐ समय की वेदिकाओं
लो हृदय का दंश देखो।
गुप्त पर संवेत होते
सूर्य का विध्वंस देखो।
सन्नी भारद्वाज,
पटना।