ग़ज़ल

चाहे अब बेशक़ सताएँ ग़म किसी भी तौर पर

टूटने देंगे न ख़ुदको हम किसी भी तौर पर

 

एक ठोकर भी जरूरी है सँभलने के लिए

मत मनाओ हार का मातम किसी भी तौर पर

 

मुस्कुराकर सामना करते रहो हालात का

आँखों को करना न हरगिज़ नम किसी भी तौर पर

 

ज़िंदगी है नाव तो पतवार है इसकी यही

खोने मत देना यहाँ संयम किसी भी तौर पर

 

हम सृजन के बीज हैं अंकुर हमें कहते हैं सब

आँकना हरगिज़ न हमको कम किसी भी तौर पर

 

©अंकुर शुक्ल ‘अनन्त’

कानपुर,उत्तर प्रदेश(भारत)

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